महालक्ष्मी व्रत कथा ऐरावत हाथी वाली पूरी कहानी | महालक्ष्मी व्रत क्यों रखा जाता हैं | hathi puja vrat katha

महालक्ष्मी व्रत कथा ऐरावत हाथी वाली पूरी कहानी | महालक्ष्मी व्रत क्यों रखा जाता हैं | hathi puja vrat katha – दोस्तों हमारा भारत देश त्यौहारों और व्रत का देश माना जाता हैं. प्राचीन समय से ही यहाँ व्रत रखने का चलन हैं. लोग व्रत एवं उपवास रखकर ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा दिखाते हैं. किसी उद्देश्य को पाने के लिए दिनभर अन्न या जल नहीं लेना और भोजन का त्याग करना ही व्रत कहलाता हैं. भगवान की विशेष कृपा पाने के लिए व्रत रखा जाता हैं.

वैसे तो साल भर में काफी व्रत आते हैं. लेकिन आज हम इस आर्टिकल में महालक्ष्मी व्रत के बारे में बात करेंगे. तथा यह व्रत क्यों रखा जाता हैं. और इसके पीछे क्या महिमा हैं. और इसके पीछे ऐरावत हाथी वाली क्या कहानी हैं. इसके बारे में जानेंगे. चलो तो आइये जानते है महालक्ष्मी व्रत के बारे थोड़ी विस्तृत जानकारी.

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महालक्ष्मी व्रत कथा ऐरावत हाथी वाली | hathi puja vrat katha

महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद मास  की शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ होता हैं. गणेश चतुर्थी के चार दिन बाद यह व्रत लगातार सोला दिन तक किया जाता हैं. महालक्ष्मी को धन और  समृद्धि की देवी माना जाता हैं. यह व्रत करके उन्हें प्रसन्न किया जाता हैं.

महालक्ष्मी व्रत करने के पीछे एक कहानी ऐरावत हाथी से जुडी हुई है. और यह व्रत कैसे किया जाता हैं. तो चलो हम आपको यह कहानी और व्रत करने की विधि के बारे में बताते हैं.

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एक समय की बात हैं. जब श्री वेदव्यासजी हस्तिनापुर पधारे थे. उनके आगमन की बात सुनकर महाराज धृतराष्ट्र उनका स्वागत किया और राजमहल के भीतर ले गए और खूब मान सम्मान दिया. उन्हें स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान करके उनका पूजन किया.

श्री व्यासजी जी से  माता कुंती और गांधारी ने हाथ जोड़कर विनंती की और कहा की आप तो त्रिकालदर्शी हो हमें कुछ ऐसा सरल व्रत बताए जिसे करके सुख-संपति, राज्यलक्ष्मी, पुत्र-पोत्रादि एवं परिवार सुखी और संपन्न रहे.  यह सुनकर श्री व्यासजी ने बताया की महालक्ष्मी व्रत करने से यह सुख समृद्धि की प्राप्ति होती हैं. इस व्रत को भाद्रपद मास की शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ किया जाता हैं.

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व्यासजी ने बताया की यह व्रत करने के लिए इस दिन स्नान करने के बाद 16 सूत के धागों का डोरा बनाए और उसमे 16 गांठ लगाके हल्दी से पिला करले. अब प्रतिदिन 16 दूब और 16 गेंहू के दाने डोरे को चढ़ाये. आश्विन कृष्ण अष्टमी को उपवास रखके एक मिट्टी के हाथी पर महालक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करे और विधि पूर्वक पूजा करे. यह सभी विधि बताकर श्री व्यासजी अपने आश्रम चले गए.

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भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को माता कुंती और गांधारी ने अपने अपने महलों में नगर की स्त्रियों सहित यह व्रत का प्रारंभ किया. और 15 दिन तक व्रत करने के बाद 16 वे दिन गांधारी ने अपने महल में नगर की सभी प्रतिष्ठित महिलाओ को पूजन के लिए बुलवा लिया. माता कुंती यहाँ कोई भी महिला पूजन करने के लिए नहीं गई और गांधारी ने माता कुंती को भी अपने महल में पूजन करने के लिए नहीं बुलाया. इस बात को माता कुंती ने अपना अपमान समझा और पूजा की तैयारी किए बिना उदास होकर बैठ गई.

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उनकी उदासीनता देखकर उनके पांच पांडव युधिष्ठर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव ने उदासी का कारण पूछा तब माता कुंती ने बताया की गांधारी ने अपने 100 पुत्रो के द्वारा हाथी की बहुत बड़ी प्रतिमा बनाकर नगर की सारी महिलाओ को उसके महल में बुलवा दिया और मेरे यहाँ कोई नहीं आया.

यह सुनकर अर्जुन ने माता कुंती से कहा की “माता आप पूजन की तैयारी करे और नगर में बुलावा लगवा देंगे  की हमारे यहाँ स्वर्ग के ऐरावत हाथी का पूजन किया जाएगा”. माता कुंती ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया इधर अर्जुन ने बाण के द्वारा ऐरावत हाथी को स्वर्ग से बुला लिया.

यह सुनकर नगर की सारी महिलाए गांधारी के महल से पूजा की थाली लेकर माता कुंती के महल में पूजन करने के लिए आ गई. महल में ऐरावत हाथी को देखने के लिए नगर के सभी लोग शामिल हो गए. माता कुंती का महल नगरजनो से ठसाठस भर गया.

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माता कुंती और सभी नगरजनो ने इंद्र के द्वारा भेजे गए ऐरावत हाथी के आते ही फुल, गुलाल, अबिल और केशर से स्वागत किया. ऐरावत हाथी पर महालक्ष्मीजी की प्रतिमा स्थापित करके राज्य पुरोहित के द्वारा विधिपूर्वक पूजन किया गया. नगरजनो ने महालक्ष्मीजी का पूजन किया. उसके बाद ऐरावत हाथी को अनेक प्रकार के पकवान खिलाए गए और यमुना का जल पिलाया गया.

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विधिपूर्वक महिलाओ ने पूजन करके 16 गांठ वाला डोरा अपने हाथो पर बांध दिया. ब्राह्मणों को भोजन करवा के वस्त्र एवं आभूषण को दक्षिणा के रूप में दिया गया. उसके पश्चात महिलाओं ने भजन कीर्तन करके रात्रि महालक्ष्मी व्रत का जागरण किया. दुसरे दिन सुबह महालक्ष्मीजी की प्रतिमा का मंत्रो के साथ जलाशय में विसर्जन किया गया. और ऐरावत हाथी को विदा करके इन्द्रलोक में भेजा गया.

इस प्रकार महिलाए महालक्ष्मी व्रत रखती है. तो सुख संपति और समृद्धि की प्राप्ति होती हैं. वह धन धान्य से पूर्ण रहते है. तथा महालक्ष्मीजी उनके घरो में विराजमान रहते हैं.

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महालक्ष्मी व्रत क्यों रखा जाता हैं.

महालक्ष्मी व्रत 16 दिन तक लगातार रखा जाता हैं. धन और समृद्धि की देवी महालक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के लिए और अपने घर में सुख शांति बनी रहे. इसलिए यह व्रत रखा जाता हैं.

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हमारे दो शब्द

दोस्तों आज हमने इस आर्टिकल (महालक्ष्मी व्रत कथा ऐरावत हाथी वाली पूरी कहानी | महालक्ष्मी व्रत क्यों रखा जाता हैं) में आपसे महालक्ष्मी व्रत के बारे में चर्चा की एवं इस व्रत को कैसे किया जाता है तथा कितने दिन तक और कब यह व्रत का प्रारंभ होता .है इस बारे में आपको बताया. तथा इसके पीछे छुपी ऐरावत हाथी की कहानी आपको बताई. महालक्ष्मीजी की पूजा आराधना करने से सुख संपति एवं शांति की प्राप्ति होती हैं. महालक्ष्मीजी की कृपा और आशीर्वाद आप पर भी बनी रहे.

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आशा करते हैं की आपको हमारे द्वारा दी गई जानकरी एवं हमारा आर्टिकल (hathi puja vrat katha) अच्छा लगा होगा.

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